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भोपाल रियासत द्वारा संस्थाओं को दान की भूमि पर उठे सवाल; विधानसभा में मामला


देवांश भारत भोपाल। भोपाल रियासत द्वारा वर्ष 1910 से 1947 के बीच श्मशान, धार्मिक और सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए दान में दी गई 12 जमीनों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इन बेशकीमती जमीनों के रिकॉर्ड गायब होने, मूल उद्देश्य बदलने और उन्हें निजी हाथों में बेचे जाने के गंभीर आरोप लगे हैं।


विधानसभा में दान की भूमि का मामला

विगत 16 जुलाई 2027 को विधायक विवेक पटेल ने ध्यानाकर्षण सूचना के माध्यम से इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि संबंधित विभाग के पास रियासतकालीन दान की भूमि की कोई समेकित या प्रमाणित सूची मौजूद नहीं है। कुछ संस्थाएं इस दान की जमीन का उपयोग मूल उद्देश्य के अनुसार नहीं कर रही हैं। कई मामलों में भूमि को निजी संस्थाओं को हस्तांतरित करने या बेचने की परिस्थितियां सामने आई हैं

आरटीआई से हुआ चौंकाने वाला खुलासा

इस पूरे मामले का खुलासा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारियों से हुआ है। मामले की कड़ियां इस प्रकार जुड़ीं:

• पहली आरटीआई (10 अप्रैल 2026): पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय विभाग से वर्ष 1900 से 1940 के बीच भोपाल रियासत के धर्मस्व विभाग द्वारा हिंदू समुदाय के मंदिरों और मरघट आदि के लिए जारी दान-पत्रों के रिकॉर्ड मांगे गए थे।

• उर्दू रिकॉर्ड का हिंदी अनुवाद: 20 मई 2026 को विभाग ने उर्दू में लिखे अभिलेख उपलब्ध कराए। इसका हिंदी अनुवाद कराने पर 3 मई 1934 की 12 संस्थाओं को दी गई भूमि की एक भूमि सूची सामने आई। इस सूची में तीसरे नंबर पर 'विश्रामघाट समिति' का नाम दर्ज है। हालांकि, वर्तमान शासकीय दावों के अनुसार यह भूमि अब सरकारी रिकॉर्ड में 'सरकारी भूमि' के रूप में दर्ज है।

दान-पत्र में 'मरघट' शब्द गायब

सूची मिलने के बाद मूल दान-पत्रों की जांच के लिए एक और कदम उठाया गया:

• दूसरी आरटीआई (29 जून 2026): मूल दान-पत्रों की प्रमाणित प्रतियां मांगी गईं। 20 जुलाई 2026 को विभाग ने विश्रामघाट समिति सहित अन्य संस्थाओं से जुड़े मूल दान-पत्र की प्रति सौंपी।

• जब इन दान-पत्रों के हिंदी अनुवाद का अध्ययन किया गया, तो विश्रामघाट समिति की भूमि के सम्बन्ध में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि इसमें कहीं भी "मरघट" शब्द अंकित ही नहीं है। जबकि स्थानीय स्तर पर राजस्व खसरे और नक्शों में यह जमीन लंबे समय से "मरघट" के रूप में ही दर्ज बताई जाती रही है।


भविष्य के गर्भ में कई सुलगते सवाल

इस खुलासे के बाद अब राजस्व विभाग और तत्कालीन रियासत के रिकॉर्ड्स पर कई बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं:

• क्या भोपाल रियासत द्वारा जगदीश मंदिर, शिव जी मंदिर और विश्रामघाट समिति आदि 12 संस्थाओं को दान में दी गई भूमि आज भी अपने मूल उद्देश्य के लिए इस्तेमाल हो रही है?

• मूल दान-पत्र, पुराने शासकीय अभिलेख और वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड (खसरे-नक्शे) में इतना बड़ा अंतर क्यों और कैसे आया?

• क्या इस विसंगति के पीछे दान की जमीनों को खुर्द-बुर्द करने का कोई बड़ा खेल चल रहा है?


इन 12 धार्मिक स्थलों की जमीनों से जुड़े इस संवेदनशील मामले में अब सरकार के रुख और आगामी जांच पर सबकी नजरें टिकी हैं।

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